दिल्ली उच्च न्यायालय में पर्यावरण प्रभाव आंकलन मामले की सुनवाई

नई दिल्ली…..

दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा कि उस समझ नहीं आ रहा कि पर्यावरण प्रभाव आंकलन (ईआईए) के मसौदे का संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल सभी 22 भाषाओं में अनुवाद करने के उसके आदेश का केन्द्र क्यों ‘‘जोरदार’’ विरोध कर रहा है। मुख्य न्यायाधीश डी एन पटेल और न्यायमूर्ति प्रतीक जालान की विशेष पीठ ने कहा कि सरकार को ईआईए के मसौदे को लेकर स्थानीय भाषाओं की आपत्तियों को समझना होगा और इसके लिए सभी 22 भाषाओं में इसका अनुवाद करने में क्या परेशानी है?  केन्द्र का पक्ष रख रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) चेतन शर्मा ने पीठ को बतया कि ईआईए के मसौदे पर उन्हें अभी तक 20 लाख प्रतिक्रियां मिल चुकी हैं,इसकारण उस इन भाषाओं में अनुवाद करने की कोई जरूरत नहीं है। एएसजी ने दावा किया कि सभी 22 भाषाओं में इस अनुवाद करने से कई प्रशासनिक परेशानियां उत्पन्न होंगी क्योंकि सरकार के पास ‘‘अनुवाद कराने के लिए साधन नहीं हैं। उन्होंने कहा कि संविधान में भी कहा गया कि अधिसूचना का सभी भाषाओं में अनुवाद किया जाना जरूरी है। अदालत ने दलील को स्वीकार ना करते हुए कहा कि आधुनिक समय में यह वास्तव में असंभव कार्य नहीं हो सकता’ और सरकार से सभी भाषाओं में ईआईए के मसौदे का अनुवाद करने में आने वाली परेशानियां को बताने को कहा। अदालत ने कहा कि संविधान कहता है कि अंतिम अधिसूचना का सभी भाषाओं में अनुवाद जरूरी नहीं है लेकिन संविधान में इस मसौदे को लेकर ऐसा कुछ नहीं है, जिस जनता की राय जानने के लिए जारी किया गया है। पीठ ने कहा, हमें समझ नहीं आता कि मसौदा सभी को समझ आए, इसके लिए उसका सभी भाषाओं में अनुवाद किए जाने के अदालत के आदेश का केन्द्र कैसे जोरदार विरोध कर रहा है। अदालत ने सरकार को 25 फरवरी तक का समय देकर अनुवाद में आने वाली परेशानियां को बताने का निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई 25 फरवरी को ही होगी। पीठ सरकार की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसने अदालत से उसके 30 जून 2020 को सुनाए फैसले पर पुनरूविचार करने का अनुरोध किया था। अदालत ने 30 जून के फैसले में पर्यावरण मंत्रालय को ईआईए के मसौदे की अधिसूचना का सभी 22 भाषाओं में अनुवाद करने को निर्देश दिया था।

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