मेरठ में कई जिलों के दिव्यांग खिलाड़ियों ने अपने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मैडल वापिसी का ऐलान करते हुए बैठे भूख हड़ताल पर

रवि उपाध्याय

मेरठ – दिव्यांगों के ऊपर हमदर्दी का आसमान लुटाने वाली सरकारों के राज में पैरा खिलाड़ियों के लिए बुरी खबर है। मेरठ में कई जिलों के दिव्यांग खिलाड़ियों ने अपने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय तमगे वापिसी का ऐलान करते हुए भूख हड़ताल शुरू कर दी है। इंटरनेशनल पैरा खिलाड़ियों का दर्द है कि सरकार ने उन्हें न सम्मान दिया और न सरकारी नौकरी.

मेरठ के रोहटा गांव में रहने वाले सचिन पैरा पावर लिफ्टिंग के अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी हैं। उन्होंने चार बार कॉमनवेल्थ खेला और देश के लिए तमगे लेकर आए। वह पैरा ओलंपिक भी खेल चुके हैं और पदक भी जीता है। केंद्रीय खेल मंत्री रहे राज्यवर्धन सिंह राठौर 2006 कॉमनवेल्थ में उनके साथ ही खिलाड़ी थे। 2018 में कॉमनवेल्थ में कांस्य पदक जीतने के बाद भी राज्य सरकार की ओर से उन्हें ना तो प्रोत्साहन राशि मिली और ना ही सरकारी नौकरी। खेल नीति में बिल्कुल साफ है कि कॉमनवेल्थ खेलने वालों को सरकारी नौकरी और आर्थिक मदद मिलेगी। लेकिन उनकी छाती पर लगे पैरा प्लेयर के तमगे के चलते खेल विभाग के अफसर उन्हें कॉमनवेल्थ का हिस्सा ही नहीं मानते।

सचिन चौधरी समेत आसपास के कई जिलों के दर्जनों पैरा खिलाड़ियों ने आज मेरठ के कैलाश प्रकाश स्टेडियम में भूख हड़ताल शुरू कर दी है। खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में जीते हुए अपने तमगे वापसी का ऐलान कर दिया है। उनका कहना है कि दिव्यांग होने के बावजूद उन्होंने अपने हौसलों के बलबूते दुनिया जीती और देश के लिए तमके हासिल किए। फिर भी ना तो सरकार और ना ही समाज उन्हें अपने बीच का हिस्सा मानने को तैयार है। सरकार में बैठे अफसर उनकी बार-बार फरियाद के बाद भी मदद करने को तैयार नहीं है। सरकार की खेल नीति साफ है लेकिन उस नीति के अनुसार अफसर काम नहीं करना चाहते। पैरा खिलाड़ियों का हौसला देखिये… ब्याज पर कर्ज लेकर देश के लिए तमगे जीत रहे है, लेकिन सरकार है कि आवाज़ ही नही सुनती।

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