कूका विद्रोह: एक अन्छूआ पहलू , पढेगे तो आसू निकल आयेगे

कूका समाज पर बहुत अत्याचार होने लगे। गुरू राम सिंह के बाद श्री हरि सिंह गुरू बने। उन्हें भैनी में नजरबन्द कर दिया गया। गुरूद्वारें के बाहर पुलिय की चैकी बिठा दी गयी। 6 वर्ष तक तो भैंणी की ऐसी दशा रही मानों शत्रु घेरा डाले पड़ा हो। न कोई भीतर से बाहर जा पाता। फिर धीरे-धीरे कुछ-कुछ लोगों का आना-जाना खुला। उस समय भी हरि सिंह बाहर नहीं आ सकते थेे-इसके बावजूद कि आने-जाने की आज्ञा हो गयी थी। आने वाले यात्रियों को काफी तंग किया जाता था। बुरी तरह अपमानित किया जाता, मुश्कें कसकर धुप में डाल दिया जाता, जहां बेचारों को घण्टो झुलसना पड़ता। चारपाई के नीचे हाथ दबाकर कई आदमी चारपाई पर बैठ जाते। उन पर हुक्का का गन्दा बदबूदार पानी डाल दिया जाता। यह सब अत्याचार करने वाले इसी देश के निवासी होते थे और इन यातनाओं को चुपचापसहन करने वाले भी इसी देश के अभागे निवासी और अब तो यह निरा धार्मिक सम्प्रदाय सह गया था। परन्तु पंजाब प्रान्त का इतिहास बड़ा रोमांचकारी है। समाज का समाज Outlaws घोषित हुआ तो पंजाब में, किसी सम्प्रदाय के सभी के सभी लोग भीषण अत्याचारों का शिकार हुए तां पंजाब में और फिर हज़ारों का सारे का सारा आन्दोलन unlawful क़रार दिया गया तो पंजाब में। इस बार भी ऐसा ही हुआ। प्रत्येक कूका अपने-अपने घर में नज़रबन्द था। बिना पुलिस की आज्ञा के कहीं बाहर न जा सकता। आज्ञा लेने जाने के मानी होते, पुलिस के अकथनीय अत्याचार, तथा अपमान सहन करना और (कई) दिनों तक भूखे-प्यासे तड़पते रहकर बाहर जाने की आज्ञा पाये बिना चुपचाप घर आकर बैठ जाना। यह दशा बहुत दिनों और बन्दिशें तो अब 1920 में आकर असहयोग के दिनों में हटायी गयीं। अस्तु!

गुरू राम सिंह जी बर्मा में ही नज़रबन्द रहे। डि. गजेटियर में लिखा है-
Finally he died in Burma in 1885 परन्तु 1920 में डसका विनासी श्री आलम सिंह इंजीनियर ने एक लेख द्वारा उपरोक्त बात का खण्डन किया था। उन्होंने लिखा था कि वे दो और साथियों सहित स्वूमत ठनतउं की किसी पोर्ट से लासट द्वीप जा हे थे। उस पोर्ट का नाम भोलमीन था। वहां पर एक दिन एक बड़े तेजस्वी व्यक्ति को पुलिस की निगरानी में सैर करते देखकर उनके सम्बन्ध में कुछ पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि ये पंजाब के राजा है। वह समझे शायद महाराजा दिलीप सिंह हों, परन्तु बाद को मालूम हुआ कि वह कूका गुरू राम सिंह जी है। उस समय उनके साथ उनका एक सूबा लक्खा सिंह भी था। उनसे मिलने पर ख़ूब बातचीत हुई ओर माजूम हुआ कि उन्हें पांच मील तक बाहर सैर करने की आज्ञा थी। खै़र! सरकार ने इस लेख का कभी प्रतिवाद भी नहीं किया। जो भी हो, मालूम ऐसा ही होता है कि गुरू जी अब इस संसार में नहीं हैं, परन्तु कूका लोगों का विश्वास है कि वे अभी जीवित है। खैर!

आज भी पंजाब में कूका सम्प्रदाय विद्यमान है। उनमें ईश्वर-भक्ति का अभी तक प्राधान्य है।बहुत सवेरे उठकर केशी स्नान कर घण्टों तक भगवद्भजन में लीन रहना, उनका नित्य नियम है। मांस, मदिरा आदि वस्तुओं के प्रयोग के कट्टर विरोधी है। एक साीभी पंजाब में कूका सम्प्रदाय विद्यमान है। उनमें ईश्वर-भक्ति का अभी तक प्राधान्य है।बहुत सवेरे उठकर केशी स्नान कर घण्टों तक भगवद्भजन में लीन रहना, उनका नित्य नियम है। मांस, मदिरा आदि वस्तुओं के प्रयोग के कट्टर विरोधी है। एक सीधी पगड़ी , एक लम्बा कुर्ता एक कच्छा – यही उनका पहनावा है। एक कम्बल और एक डोलक- सा बना हुआ बड़ा-सा लोटा और एक टकुआ जिसे वे सफाजंग बोलते हैं -यही उनका सामान है। गले में सूत की बनी हुई एक सुन्दर माला रहती है। उनमें भी एक विशेष मस्ताना दल होता है। वे शबद -कीर्तन करते हुए एकदम सुध-बुध भूल जाते है। इन लोगों के संकीर्तन से प्रत्येक व्यक्ति प्रफुल्लित तथा रोमांचिक-सा हो जाता है। खून खौलने लगता हैं, आँखो में प्रेम तथा भक्ति के आसूं भर आते है।
ग्यारहवें और बारहवें गुरू में विश्वास रखने के कारण तथा मांस, मदिरा के कट्टर विरोधी होने के कारण वे शेष सिक्ख समाज से जुदा है। उनमें समानता का भाव प्रबल होता हैं। होली आदि के अवसर पर उनके विशेष उत्सव होते है, जहाँ तक कि खूब होम यज्ञ होता हैै शेष सिक्ख इसके विरोधी हैं। कूका अपने को हिन्दू मानते है, शेष सिक्ख नही। विगत अकाली आन्दोलन के दिनों में उन्होने अकालियों का कुछ विरोध किया था जिससे उनकी स्थिति कुछ खराब हो गयी। तथापि वे अपने ढंग के निराले लोग है। उन्हे देख एक उस अधखिले फूल की याद आती है जो खिलते ही मसल डाला गया हो। गुरू राम सिंह जी की हसरतें दिल-की-दिल ही में रह गयी थीं। उनके शेष सभी अनुयायियों का आत्मबलिदान भी विस्मृत हो गया। उन अज्ञात लोगों के बलिदानों का क्या परिणाम हुआ, सो वही सर्वज्ञ भगवान जाने। परन्तु हम तो उनकी सफलता-विफलता का विचार छोड़ उनके निष्काम बलिदान की याद में एक बार नमस्कार करते हैं।


ग्यारहवें और बारहवें गुरू में विश्वास रखने के कारण तथा मांस, मदिरा के कट्टर विरोधी होने के कारण वे शेष सिक्ख समाज से जुदा है। उनमें समानता का भाव प्रबल होता हैं। होली आदि के अवसर पर उनके विशेष उत्सव होते है, जहाँ तक कि खूब होम यज्ञ होता हैै शेष सिक्ख इसके विरोधी हैं। कूका अपने को हिन्दू मानते है, शेष सिक्ख नही। विगत अकाली आन्दोलन के दिनों में उन्होने अकालियों का कुछ विरोध किया था जिससे उनकी स्थिति कुछ खराब हो गयी। तथापि वे अपने ढंग के निराले लोग है। उन्हे देख एक उस अधखिले फूल की याद आती है जो खिलते ही मसल डाला गया हो। गुरू राम सिंह जी की हसरतें दिल-की-दिल ही में रह गयी थीं। उनके शेष सभी अनुयायियों का आत्मबलिदान भी विस्मृत हो गया। उन अज्ञात लोगों के बलिदानों का क्या परिणाम हुआ, सो वही सर्वज्ञ भगवान जाने। परन्तु हम तो उनकी सफलता-विफलता का विचार छोड़ उनके निष्काम बलिदान की याद में एक बार नमस्कार करते हैं।

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