पुलिस का इंमान जिन्दा था तो पीड़िता व आरोपी को एक ही गाडी में लेकर क्यो गई कोर्ट

डा0 संजय खटाना

हरिद्वार – जिस मुल्क में बहन बेटियो का सम्मान सुरक्षित नही रहता ,उस गांव मौहल्ला शहर (इलाके) के लोग जिन्दा होते है, चलते है, फिरते है, सिर्फ दिखने के लिये। वास्तव में वहा शमशान जैसा सन्नाटा होता है। वहा के बाशीन्दे कब्रो में पडे मुद्रो की तरह शान्त होते है। कहते है डूब कर मर जाना चाहिये वहा के चौधरीयो, ठाकुरो व क्षेत्राधिकारीयो को । क्योकि बेटी बाप की नही दादा की नही, मां या दादी की नही परिवार की नही,बल्कि पूरी कौम व पूरे गांव की होती है। जब बेटी इलाके के स्कुल या संस्थान में जाती है। तो वहा बाप का नाम नही, गांव का नाम बताती है। जब दूसरे जनपद में जाती है तो अपने जनपद को नाम बताती है। जब दूसरे प्रदेश में जाती है। तो अपने प्रदेश की बेटी कहलाती है और जब देश से बाहर जाती है। तो भारत की बेटी कहलाती है।

बलात्कार सैंदूल गांव की 9 वर्ष की दलित मां की बेटी का नही हुआ है। बल्कि बलात्कार हुआ है सैंदूल गांव की हर मां,बहन,बेटी के मान सम्मान का। बलात्कार हुआ है, मुछो पर ताव देकर जातिवाद का डंका पीटने वाले तथाकथित बडी जाति के सभी सैंदूल वासीयो का। बलात्कार हुआ है, नैनबाग चौकी स्टाफ का तथा वहा के थाना इंचार्ज का, बलात्कार हुआ है, टिहरी के डी0एम0 और एस0एस0पी का । बलात्कार हुआ है,वहा के विधायक व सांसद का । बलात्कार हुआ है, प्रदेश के मुख्यमंत्री के मान सम्मान ,स्वाविमान का । बलात्कार हुआ है,देवभूमि के उज्जवल गौरव का। बलात्कार हुआ है, मानवता का, इंसानियत का। बलात्कार हुआ है, वहा के कलमकारो का । क्योकि बेटी किसी एक पिता या परिवार का मान सम्मान नही बल्कि पूरे गांव, देहात ,ब्लांक , तहसील, जिला, प्रदेश, देश का गौरव होती है। और सबसे बडा अपमान है। उसे गांव के ठाकुरो व ब्राहम्ण का जो खुद को दूसरे से उच्च समझाने वाले है।

क्योकि उच्च कोई तभी तक रहता है जब तक वहा न्याय,इंसानियत व मानवता जिन्दा हो जिस गांव में हवस के भूखे भेडीये 9 साल की बच्ची को हवस का शिकार बनाने के बाद पुलिस की गिरफ्त से बाहर रहे,और सही सलामत रहे। और इतनी दर्दनाक घटना के बाद एक मां को अपनी बेटी को कंघे पर 8 किलो मीटर पैदल ले जाना पड़े तो ऐंसे बस्ती के लोग कभी भी खुद को उच्च नही समझ सकते ।

बेटीया साझी होती है। गांव के क्षेत्र का गौरव होंती है। बड़ा दुर्भाग्य है मेरे वतन का। अब बेटीयो की इज्जत का मोल जातिवादी हो गया है। ये देश पूछना चाहता है। कि आखिर क्या बजह थी इस सैंदूल गांव की बेटी के साथ दरिन्दगी हुई और एक अबला मां को 8 किलो मीटर पैदल चलकर जाना पडा। क्यो तीन दिन तक कोई सुनवाई नही हुई। सबसे बड़ा सवाल कानून व्यवस्था पर की इतनी बडी घटना के बाद एक बाप कानूनी कार्यवाही की हिम्मत नही जूटा पाया। क्या डर था। क्या लाचार बाप को इंसाफ के मंन्दिर की सीढीयो पर खड़े पहरे दार जातिवादी नजर आये। या शिकयत के बाद गांव में रहना दुभर नजर आया।

अखिरकार बाप के दिमाग में कौन सा डर बैठा था।
डर सच्चा था जिसको वहा की पुलिस ने साबित कर दिया कोर्ट में बयान देने के लिए ले जाते समय पीड़िता और आरोपी को एक ही गाड़ी में ले जाया गया। इस घटना ने उत्तराखण्ड को पूरी दूनिया के सामने शर्मशार कर दिया। आज कहा है वो लोग जो कैंडल मार्च निकालते है। और सड़को पर आते है। सोशल मीडिया पर न्याय की मुहिम चलाते है। चुप शायद इसलिये है। क्योकि वो बेटी देश की नही, प्रदेश की नही, नैनबाग की नही , सैंदूल गांव की नही बल्कि एक अछूत गरीब शुद्र जाति में पैदा हुये गरीब बाप की बेटी है।

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