लहू की एक—एक बूंद का हिसाब

” मै अपने देशवासियो के लहू की एक—एक बूंद का हिसाब इस हत्याकाण्ड के जिम्मेदार तीनो हत्यारों से लूंगा।” शहीदें आजम क्रान्तिकारी वीर शहीद उधमसिंह ने यह दृढ संकल्प तब लिया था,जब उन्होने जलियांवाला बाग के नृशंस हत्याकाण्ड को देखा था। महान देश भक्त क्रान्तिकारी वीर श्री उध​मसिंह के पास सिर्फ एक ही लक्ष्य था कि अन्यायी अत्याचारी शासन से देश व समाज को मुक्ति दिलायी जाए। भारत की स्वतन्त्रता क्रान्तिकारी वीर भगतसिंह और उधमसिंह की विरासत है। क्रान्ति और त्याग की संचेतना भारत नव—निर्माण की आवश्यकता कड़ी है। राष्ट्र निर्माण में शहीदो के लहू और जीवन अमूल्य है। ये सदैव समाज को उर्जा व प्रेरणा देने का कार्य करेंगें। शहीदो आजम उधमसिंह के व्यक्तिगत एवं कृतित्व की जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है। भारत अधिकांश युवा पीढी दिग्भ्रमित है। सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यो का हास हो रहा है। अदम्य साहस, महान त्याग एवं गौरवशाली बलिदानियो का कृतित्व भुलाया नही जा सकता ।” एक अनाथ बालक, निर्धन, श्रमिकवर्ग, का क्रान्तिकारी युवक 13 मार्च,1940 को जलियांवाले बाग के भीषण हत्याकांड के तत्कालीन गर्वनर सर माईकल ओ डयर को उसके ही घर लन्दन में मारने वाले शहीद उधमसिंह को बीस साल ग्यारह माह तक में बहुत सी मुश्किलो का सामना करना पड़ा था।” 31 जुलाई 1940 फांसी दिये जाने वाले दिन तक बहुत सारी यातनांए झेलनी पड़ी थी। एक प्रसिद्ध पत्रकार ने लिखा है कि ” हमारे भाग्य में तो मैयारी ही वही है। हमें नींव के वे पत्थर हो जाना है।, जिन्हे कोई जानेगा नही और इच्छा करने पर भी जिन पर पूजा की कोई सामग्री चढाई न जायेगी।

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