कृतिदेव यहां ज्वाला देवी में गुरु तेग बहादुर की पुण्यतिथि पर किया गया नमन

प्रयागराज।

सिख समुदाय के नौवें गुरु तेग बहादुर एक सदाचारी व्यक्ति थे। उनका असली नाम त्याग मल था। उनके त्याग और बलिदान के लिए उन्हें “हिन्द दी चादर” भी कहा जाता है। उनका बलिदान हम सभी को यह प्रेरणा देता है कि धर्म से बढ़कर कुछ भी नहीं है और हमें हमेशा अपने धर्म की रक्षा करनी चाहिए।
यह बातें प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) शिक्षा प्रसार समिति द्वारा संचालित ज्वाला देवी सरस्वती विद्या मन्दिर इण्टर कॉलेज, सिविल लाइंस में मंगलवार को गुरु तेग बहादुर की पुण्यतिथि पर विद्यालय के प्रधानाचार्य विक्रम बहादुर सिंह परिहार ने कही। उन्होंने छात्रों को सम्बोधित करते हुए कहा कि इस्लाम कबूल न करने पर चांदनी चौक में मुगल बादशाह औरंगजेब ने उनका सिर कटवा दिया था। आज उसी जगह पर शीशगंज नाम से गुरुद्वारा बना हुआ है।
विद्यालय में हिन्दी के आचार्य गणेश द्विवेदी ने बताया कि गुरु तेग बहादुर का जन्म 18 अप्रैल 1621 को अमृतसर में हुआ था और 24 नवम्बर 1675 को शहीद हुए थे। मुगल बादशाह औरंगजेब चाहता था कि सिख गुरु इस्लाम स्वीकार कर लें लेकिन गुरु तेग बहादुर ने इससे इनकार कर दिया था। उन्हें “करतारपुर की जंग” में मुगल सेना के खिलाफ अतुलनीय पराक्रम दिखाने के बाद तेग बहादुर नाम मिला। 16 अप्रैल 1664 को वो सिखों के नौवें गुरु बने थे।
मुगल बादशाह ने गुरु तेग बहादुर से मौत या इस्लाम स्वीकार करने में से एक चुनने के लिए कहा। उन्हें डराने के लिए उनके साथ गिरफ्तार किए गए उनके तीन ब्राह्मण अनुयायियों का सिर कटवा दिया। लेकिन गुरु तेग बहादुर नहीं डरे। गुरु तेग बहादुर ने जब इस्लाम नहीं स्वीकार किया तो औरंगजेब ने उनकी भी हत्या करवा दी। अपनी शहादत से पहले गुरु तेग बहादुर ने आठ जुलाई 1975 को गुरु गोविंद सिंह को सिखों का दसवां गुरु नियुक्त कर दिया था। यह कार्यक्रम विद्यालय के जयन्ती प्रमुख आचार्य ब्रह्म नारायण तिवारी द्वारा आयोजित किया गया। इस अवसर पर विद्यालय के सभी आचार्य एवं छात्र उपस्थित रहे।

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