बर्ड टूरिज्म की अवधारणा को धरातल पर उतारने की तैयारी 

 देहरादून
  वन पंचायतों में बर्ड टूरिज्म की अवधारणा को धरातल पर उतारने की तैयारी है। इसके लिए वन विभाग ठोस कार्य योजना तैयार करने में लगा हुआ है। आने वाले दिनों में इस कार्य योजना काो अमली जामा पहना कर उत्तराखण्ड को बर्ड टूरिज्म की सौगात दी जाएगी।
देश में वन पंचायतों की एकमात्र व्यवस्था वाले उत्तराखंड में पक्षी प्रेमी अब पंचायती वनों में भी परिंदों के मोहक संसार का दीदार कर सकेंगे। वन महकमा पहली बार वन पंचायतों में बर्ड टूरिज्म की पहल करने जा रहा है। प्रायोगिक तौर पर कार्बेट टाइगर रिजर्व से सटी मंदालघाटी की सात वन पंचायतों के अधीन आठ वर्ग किलोमीटर के वन क्षेत्र में इसे मूर्त रूप दिया जाएगा। विभाग के मुखिया प्रमुख मुख्य वन संरक्षक राजीव भरतरी ने अतिरिक्त भूमि संरक्षण वन प्रभाग रामनगर के डीएफओ को तत्काल कार्ययोजना तैयार करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही कार्बेट टाइगर रिजर्व प्रशासन को मंदालघाटी में बर्डिंग कैंप आयोजित करने और स्थानीय युवाओं के लिए नेचर गाइड आदि से संबंधित प्रशिक्षण की व्यवस्था करने को कहा है।
उत्तराखंड में वनों के संरक्षण-संवद्र्धन में जनसामान्य की भागीदारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से वन पंचायतों की व्यवस्था 1932 से चली आ रही है। राज्य में अब तक 12089 वन पंचायतें अस्तित्व में आ चुकी हैं। इनके अधीन वन क्षेत्र का दायरा है 7350 वर्ग किलोमीटर। वन पंचायतें ही इन वन क्षेत्रों का प्रबंधन, संरक्षण-संवद्र्धन करती हैं। अब वन पंचायतों के सशक्तीकरण के मद्देनजर वहां पर्यटन से जुड़ी ऐसी गतिविधियां संचालित करने पर फोकस किया जा रहा है, जिससे प्रकृति को कोई नुकसान भी न पहुंचे और ग्रामीणों को आय भी हो सके।
इसी क्रम में वन पंचायतों में बर्ड टूरिज्म की अवधारणा को धरातल पर उतारने की तैयारी है। प्रयोग के तौर पर इसके लिए कार्बेट टाइगर रिजर्व से लगी पौड़ी जिले की मंदालघाटी के ढिकोलिया, झर्त, धामधार, कर्तिया, जुई-पापड़ी समेत सात गांवों की वन पंचायतों को चयनित किया गया है। कार्बेट से लगी इन वन पंचायतों के अधीन वन क्षेत्रों की पक्षी विविधता बेजोड़ है। वजह ये कि तीन तरफ कार्बेट से लगे इस क्षेत्र में पहाड़, मैदान, घाटी सभी तरह की परिस्थितियां हैं, जो परिंदों को खूब भाती हैं। कार्बेट में परिंदों की लगभग छह सौ प्रजातियां चिह्नित हैं, जो अक्सर यहां भी देखी जा सकती हैं। इसके अलावा हिमालयन सिराऊं या सीरों (गोट एंटीलोप) भी यहां बहुतायत में दिखता है। साथ ही इस क्षेत्र में हाथियों का मूवमेंट भी ना के बराबर है।
प्रमुख मुख्य वन संरक्षक राजीव भरतरी के मुताबिक इस सबको देखते हुए मंदाल नदी के किनारे की इन वन पंचायतों में बर्ड टूरिज्म को बढ़ावा देने का निश्चय किया गया है। जापान की फंडिंग एजेंसी जायका के वित्त पोषण से इस पहल को आगे बढ़ाया जाएगा। उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में साहसिक पर्यटन की भी अपार संभावनाएं हैं। इस लिहाज से भी भविष्य में कदम बढ़ाए जाएंगे। उन्होंने कहा कि बर्ड टूरिज्म का प्रयोग सफल रहने पर इसे अन्य वन पंचायतों में भी लागू किया जाएगा।
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